दादा जी को कहते सुना है...
"पगडंडियों के रास्ते हमारे गावं में खुशहाली आएगी" .
पत्तों से छानते पानी से प्यास बुझाते लोग
अपने खेतों में पसीना बहाना जानते हें.
अभी भी बैलों को जोतने से पहले
जलेबी खिलाया जाता है.
बिजली आएगी...बिजली आएगी
कहते कहते मेरा बचपन खो गया..
अब नए खेप के बच्चे कहते हें
बिजली आएगी बिजली आएगी...
दशकों पहले गड़े पोल के अवशेष
श्रीकांत सिंह के सब्जी बड़ी में मिल जायेंगे...
कटीले तार के घेरे में आधार बन
सब्जी बचाते हुए .
चौकीदार अभी भी
दो रुपये प्रति घर रखवाली करता है.
मल्लाह सालाना दो किलो धान पर
गंगा पार करता है.
बच्चे अभी भी चमचमाते गाड़ी के पीछे
भागने से गुरेज़ नहीं करते.
बूढी दादी मेहमानों के लिए सुखी मिठाई
छुपा कर रखती है.
अभी भी दादी अपने
भाइयों से मिल कर रोंती है
शायद कह रही हो ..
मुझे इस गावं में क्यों ब्याहा
जहाँ रोड नहीं..
और रोड आने की संभावना भी नहीं..
और दादा जी यही कहते....
"पगडंडियों के रस्ते हमारे गावं में खुशहाली आएगी".
-------अरशद अली----